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Saturday, January 2, 2010

हि‍न्‍दी संसार में अक्षांश व देशान्‍तर की रेखाएं-1

वि‍शाल हि‍न्‍दी पट्टी में साहि‍त्‍य सृजन का जो कन्‍द्रीय प्रवाह है, उसमें वि‍भि‍न्‍न अंचलों और दि‍शाओं की लेखकीय उर्जा वि‍सर्जि‍त होती है, तो भी पीड़क सच यह है कि‍ उस संगम में जानी-मानी नदि‍यों की जलधारा तो मान-सम्‍मान पाती है, मगर अनगि‍नत अन्‍त:सलि‍लाओं के अंशदान को लगभग नकार दि‍या जाता है। आज भी देश-देशान्‍तर की नदि‍यों को जोड़ कर जन चेतना की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ के सम्‍यक वि‍तरण की सांस्‍कृति‍क इंजीनि‍यरींग कारगर नहीं दि‍खती। बहरहाल ऐसी कोशि‍शें जारी हैं, तो भी मुश्‍कि‍लें हल पर भारी हैं।
बेशक यह मामला लेखकों के काम, नाम या दाम तक ही महदूद नहीं है, क्योंकिइससे सामयि तौर पर अभिव्यक्तिके दबावों, रूझानों, दिशाओं और रूपाकारों की नियतिजुड़ी हुई है। लिहाजा, चंद जरूरी सवालों से रूबरू हुआ जाये जो समूची स्थितिपर भरपूर रोशनी डालते हैं। हिन्दी सर्जना के आंचलि परिदृश् पर गौर कीजि तो उसकी बुनियाद मलबे में दबी नजर आयेगी। सोचि, क्या बेहतर और प्रभावी रचनाओं की अन्तर्वस्तु का कोई आंचलि पहलू नहीं होता ? क्या कोई क्षेत्रीय या स्थानि प्रेरणा अभिव्यक्तिके कथ् और संदेश के आकार प्रकार को निर्धारि नहीं करती ? क्या कृतिऔर परिवेश के जैवि सम्बन्धों की अनदेखी होने से रचना से प्रक्षेपि अर्थ संदर्भरहि हो कर धुंधला नहीं हो जाता है ? अगर नहीं, तो पूछा जा सकता है किनिर्मला पुतुल और विद्याभूषण की कविताएं, योगेन्द्र नाथ सिनहा, संजीव और मनमोहन पाठक की कथाकृतियां, किट्टू और प्रियदर्शी की व्यंग् रचनाएं, रामदयाल मुंडा और बीपी केशरी की देशज अवधारणाएं- इन सब का उत् कहां है ? उनकी भाषि अभिव्यक्तिकी जड़ें अपनी रचनाभूमिसे बाहर और कहां खोजी जा सकती हैं ? यह अलग बात है किलेखक हर बार और हर जगह सिर्फ अपने निकट वर्तमान से प्ररि नहीं होता और अन् स्रोतों से सुलभ होती दिशा-दृष्टिभी उसे मानवीय मूल्यों से समृद्ध करती है।
अगर हि‍न्‍दी सर्जना के आंचलि‍क परि‍दृश्‍य को सामने रखें और झारखंड में लि‍खे जा रहे साहि‍त्‍य को सि‍र्फ कलावादी रूझान से नहीं परखें तो अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की उस भूमि‍का से परि‍चय हो सकता है जहां वह अपने समय और समाज की सांस्‍कृति‍क समालोचना में लगी रहती है। अब यह बेझि‍झक कहा जा सकता है कि‍ इस पठार में भाषि‍क सर्जना की तीन पीढ़ि‍यां काम कर चुकी हैं और उनमें कई लेखकों का कृति‍त्‍व बड़े फलक पर चर्चा में रहा है। इसके बावजूद सच यह भी है कि‍ कई नरगि‍सों को दीदावर का इंतजार है और कई जरखेज चीजें उपेक्षा के अंधेरे कोनों में छुपी हैं। पूछा जा सकता है कि‍ आखि‍रश ऐसा क्‍यों हो रहा है। दरअसल यह सवाल खासा वि‍वादग्रस्‍त है और उसके तमाम ओर-छोर एक-दूसरे से बेतरतीब उलझे हुए हैं।
सभी जानते हैं कि‍ आजादी के बाद हिन्दी भाषा-साहित् की नियामक गतिविधियों का केन्द्र बनारस-इलाहाबाद-पटना-कोलकाता से उठ कर दिल्ली में अन्तरि होता गया। धीरे-धीरे दिल्ली का दबदबा बढ़ता गया और जयपुर-भोपाल जैसे नये केन्द्र भी बने। तो भी आज की तारीख में दिल्ली का कोई प्रतियोगी नहीं दिखता। हिन्दी पट्टी के दूर-दराज इलाकों से नये-पुराने कलमकार राजधानी में शिफ्ट हो रहे। कहते हैं किभाषा की प्रगति‍ और विकास के लि किसी महानगर की छतरी मददगार होती है। अनेक दूसरी भाषाओं के भौगोलि संदर्भों को ध्यान में रखा जाये तो इस राय में कोई खोट नजर नहीं आती। लेकि सत्ता खुद कई संकट खड़े कर लेती है और यही हिन्दी रचनाशीलता की पहचान का संकट भी है। हिन्दी की बहुसंख्यक पत्र-पत्रिकाएं राजधानी से संचालि होती हैं। यही स्थितिपुस्तक प्रकाशन जगत की भी है। नि‍‍र्णायक संख्या में जाने-माने प्रकाशक दिल्ली में बैठे हैं। ऐसी भूभौतिकी में अगर हिन्दी सर्जना की दशा-दिशा राजधानी दिल्ली से संचालि निर्देशि होती हो तो इसमें अचरज की बहुत गुंजाइश नहीं। आज की तारीख में प्रकाशन, मूल्‍यांकन, उत्पादन और वितरण तंत्र पर राजधानी का अप्रत्यक्ष एकाधि‍कार है और दिल्ली दरबार के प्रादेशि क्षत्रप और क्षेत्रीय एजेंट उसके वर्चस् की पहरेदारी करते हैं। ऐसे माहौल में अपनी पहचान बनाने में अधि‍क सफल वही लोग हैं जि‍नके तार मजबूत खूंटों से बंधे हैं।
चाहे ऐसे खूंटे लेखक संगठन सुलभ करते हों या वि‍श्‍ववि‍द्यालय परि‍सर के संपर्क सूत्र या फि‍र संपादकों-आलोचकों की गुटबाज जमात। आम तौर पर बहुसंख्‍यक हि‍न्‍दी लेखक ऐसे अभयारण्‍यों को रेस्‍ट हाउस की इज्‍जत नहीं देते और नतीजतन अपनी मान्‍यता के लि‍ए संघर्षशील बने रहने को अभि‍शप्‍त बने रहते हैं।

6 comments:

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

रावेंद्रकुमार रवि said...

आशा है - भविष्य में इस ब्लॉग पर अच्छी रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगी!
नए वर्ष पर मधु-मुस्कान खिलानेवाली शुभकामनाएँ!
सही संयुक्ताक्षर "श्रृ" या "शृ"
FONT लिखने के चौबीस ढंग
संपादक : "सरस पायस"

shama said...

Tahe dilse swagat hai..!

kshama said...

Blog jagat me aapka swagat hai..parichhed gar thode chhote hon, to padhne me suvidha rahegee..! Anyatha na len...ek sujhaw maatr hai..

संगीता पुरी said...

इस नए वर्ष में नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आशा है आप यहां नियमित लिखते हुए इस दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होंगे .. आपके और आपके परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

dweepanter said...

नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ द्वीपांतर परिवार आपका ब्लाग जगत में स्वागत करता है।